06/04/2021
BS6 क्या है?
भारत सरकार मोटर वीइकल्स से निकलने वाले प्रदूषकों (पलूटेंट्स) को नियंत्रित करने के लिए मानक तय करती है। इसे बीएस, यानी भारत स्टेज कहा जाता है। ये मानक केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तहत निर्धारित किए जाते हैं।
प्रमुख प्रदूषक
अब यह समझना जरूरी है कि मोटर वीइकल से कौन से प्रमुख प्रदूषक निकलते हैं। पेट्रोल-डीजल इंजन मुख्य रूप से कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), कार्बन मोनोऑक्साइड (CO), हाइड्रोकार्बन (HC) और नाइट्रोजन के ऑक्साइड (NOx) को निकालते हैं। इनके अलावा पर्टिकुलेट मैटर (PM) या कार्बन सुट डीजल के साथ-साथ डायरेक्ट-इंजेक्शन पेट्रोल इंजन का भी एक अन्य बाय-प्रॉडक्ट है।
BS4 के बाद सीधे BS6 क्यों?
भारत में पहली बार साल 2000 में ‘India 2000’ नाम से एमिशन नॉर्म्स लागू किए गए। इसके बाद साल 2005 में BS2 और 2010 में BS3 को लागू किया गया था। देश में BS4 एमिशन नॉर्म्स साल 2017 में लागू हुए। बढ़ते पलूशन लेवल और लंबे गैप को देखते हुए BS5 को छोड़कर सीधे BS6 एमिशन नॉर्म्स लागू करने का निर्णय लिया गया।
बीएस4 और बीएस6 एमिशन लिमिट में क्या फर्क है?
BS6 एमिशन नॉर्म्स अपेक्षाकृत सख्त हैं। बीएस4 की तुलना में इसमें NOx का लेवल पेट्रोल इंजन के लिए 25 पर्सेंट और डीजल इंजन के लिए 68 पर्सेंट कम है। इसके अलावा डीजल इंजन के HC + NOx की लिमिट 43 पर्सेंट और पीएम लेवल की लिमिट 82 पर्सेंट कम की गई है। इस टारगेट को पूरा करने के लिए बीएस6 कम्प्लायंट इंजन में मॉडर्न टेक्नॉलजी का इस्तेमाल किया जाता है।
क्या बीएस4 गाड़ियां बीएस6 फ्यूल से चलेंगी?
इसका जवाब है हां। बीएस4 कम्प्लायंट वीइकल बीएस6 फ्यूल पर बिना किसी समस्या के चल सकते हैं, खासकर अगर यह पेट्रोल कार है। डीजल इंजन में फ्यूल में सल्फर कॉन्टेंट फ्यूल इंजेक्टर के लिए लूब्रिकेंट के रूप में कार्य करते हैं। बीएस4 फ्यूल की तुलना में बीएस6 फ्यूल में सल्फर कॉन्टेंट पांच गुना कम है। इसके चलते लूब्रिकेंट की कमी की वजह से लंबे समय बाद फ्यूल इंजेक्टर में खामी आ सकती है।
क्या बीएस6 गाड़ियां बीएस4 फ्यूल से चलेंगी?
यहां भी लगभग ऊपर जैसी स्थिति ही है। पेट्रोल इंजन में कोई समस्या नहीं होगी, क्योंकि इसका फ्यूल कम्पोजिशन बहुत अलग नहीं है। मगर डीजल इंजन के लिए ऐसा नहीं कहा जा सकता है।