11/06/2024
रितु ने अपने पति राहुल से कहा:- देखो न गुनु दो दिन से कुछ परेशान रहता है, रात को भी सो नही पाता है..आप तो खाना खा कर खर्राटे लेकर सो जाते हो।
राहुल बाइक स्टार्ट करते हुए:- आज साम को डॉक्टर के पास चलते है। यह कहने के बाद राहुल अपने भाई के साथ नौकरी के लिए फैक्ट्री चला गया।
जनवरी की सर्दी वाली रात थी। मानो कुहासा कह रहा हो आज ही पूरी क्षमता से धरती पर आऊंगा। ठंड की पारा दो डिग्री के आस पास थी।
राहुल और मोनू दोनों भाई अपने माता पिता के साथ दिल्ली के नांगलोई में रह रहे थे।
परिवार में बड़े बेटे राहुल की शादी दो साल पहले हुई थी, एक साल पहले घर में किलकारियां गूंजी थी गुनु के रुप में , पूरा परिवार खुश था।
दोनो भाई नोएडा के एक्सपोर्ट हाउस में जॉब करते थे , साथ में आना,जाना और परिवार के साथ खुश रहना यह दिनचर्या थी। दिल्ली महानगर में अपना घर हो तो इंसान खुश रहता है, किराया जो नही देने पड़ते।
राहुल साम को समय से पहले घर आ गया डॉक्टर के पास जाने के लिए, लेकिन गुनु खेल रह था और आज दिन में सोया भी था।
राहुल : चलो रितु, गुनु को डॉक्टर के पास लेकर चलते है।
रितु:- अब ठीक लग रहा है, आज दिन में सोया भी था, रहने देते है..कोई बीमारी लग तो नही रही है।
राहुल:- नही, डॉक्टर के पास चलते है।
रितु:- एक दो दिन देख लेते है ....। उनको लगा सब ठीक ही तो है और वे लोग डॉक्टर के पास नही गए।
राहुल ने आज जल्दी हॉफ डे छुट्टी लेकर आया था, पैसे कटने का डर नौकरी पेशे वाले को लगा रहता है।
रात्रि 10 बजे के आस पास गुनु की बेचैनी बढ़ने लगी, अब रितु को लगने लगा उसने डॉक्टर के पास न जाकर गलती की है।
रितु ने राहुल से पूछा:- आपने परिवार के लिए मेडिकल पॉलिसी ली है क्या ?
राहुल:-नही, क्यों?
रितु अपने आप को कोसने लगी, काश मै यह दो साल पहले सवाल करती... शादी से पहले तो ठीक था।
राहुल ने एमबीए किया था फाइनेंस में, रितु ने एलएलबी किया था, लेकिन राहुल इतना बड़ा गलती करेगा वह सपने में भी नही सोच सकती थी।
पूरे परिवार ने आठ लाख रुपया बचाया था दो साल में ..अब राहुल को लग रहा था की यह पैसे अब पानी की तरह ख़त्म होगे।
राहुल ने गूगल सर्च किया, दिल्ली के अच्छे सरकारी अस्पताल पास में कौन सा है ?
सरकारी तो सरकारी है:- रितु ने कहा।
इस बातचीत और सर्च में आधा घंटा बीत चुका था, गुनु की हालत और खराब हो रही थी।
दिल्ली के सरकारी अस्पताल में व्यस्था है की रात्रि के इमरजेंसी केस में भर्ती कर लिया जाता है रोगी को।
रात में बाइक से अस्पताल जाना थोड़ा आवारा कुत्तों से डर था, रात के समय दिल्ली के सड़को पर उनका भी डर होता है।
घर से बाहर निकलते ही अंबेडकर अस्पताल के लिए ऑटो मिला गया।
अस्पताल पहुंचते ही अस्पताल प्रशासन ने इमरजेंसी वार्ड के लिए भर्ती कर लिया।
राहुल और रितु दोनो वार्ड के बाहर थे... थोड़ी देर में डॉक्टर ने इलाज करके वार्ड में ही एक बेड दे दिया।
राहुल ने मां को फोन किया:- मां, अब गुनु ठीक है, ऑक्सीजन लगी हुई है अब तकलीफ नहीं है, वह सो रहा है।
इन दो घंटो में ही , पूरे परिवार के मन मस्तिक पर एक डर सवार हो गया, 25 साल बाद इस घर में पिछले साल किलकारियां गूंजी थी वह भी ईश्वर ने आज डर के माहौल में बदल दिया।
सभी ने शुकून की सांस ली, मानो खतरा टल गया हो, लेकिन कर्म और किस्मत से इन्सान कभी छूटा कहा है? ईश्वर को तो कुछ और ही मंजूर था।
रात्रि तीन बजे अस्पताल प्रबंधन से खबर मिली की अब ऑक्सीजन नही है, है भी तो जो पहले से रोगी है उनके लिए ही है , अब कुछ भी होगा वह कल सुबह नौ बजे के आस पास ही होगा।
इस बीच राहुल घर आ गया था और मां और रितु अस्पताल में थे। जैसे लग रहा था सबकुछ ठीक रहा तो राहुल कल जॉब पर चला जायेगा, बुरारी में 12 लाख का जमीन का एक टुकड़ा लेना था इसलिए वह छुट्टी भी नही कर सकता।
लेकिन विधान में तो कुछ और लिखा था।
सरकारी अस्पताल के व्यस्था से अब उम्मीदें टूट चुकी थी इस परिवार की। परिवार बिल्कुल डर गया और गुनु को खोने का डर सताने लगा। सर्दी वाली रात अलग से।
राहुल खाना खाकर सोने जा रहा था तभी फोन की घंटी घनघनाई।
राहुल समझ गया।
अब रात्रि के तीन बजे ऑटो भी नही मिलेगा, राहुल ने अपनी बाईक निकली और अस्पताल के लिए निकल पड़ा।
गलियों से बाहर निकलते ही, कुतो का एक झुंड ने हमला किया और पैरों में बुरी तरीके से नोच लिया।
बड़ी मुश्किल से अपने को बचाता हुआ राहुल अस्पताल पहुंचा, इस बार वह घर से नगद लेकर गया था।
दिल्ली रोहिणी में ही एक बड़े निजी अस्पताल का रुख किया बिना समय गंवाए।
अस्पताल में 15 मिनट के अन्दर सबकुछ व्यस्था हो गई, दो लाख नकद काउंटर पर जमा करवाया गया।
निजी अस्पताल के निजी वार्ड में पांच सितारा होटल वाला फील आ रहा था, गुनु अब चैन की नींद सो रहा था।
जो डर था वह अब अस्पताल पहुंच कर लग रहा था खत्म हो चूका था।
अगले दिन राहुल ने कुते के काटने के बाद वाला टीका राम मनोहर लोहिया अस्पताल से लगवा दिया था 24 घंटे पहले ही।
तीन दिन बाद डिस्चार्ज हो गया था गुनु, अब गुनु की दादी खुश थी, मानो एक तूफ़ान आकर चला गया हो...ऊपर से घर के दरवाजे और छत को हिलाकर।
मोनू ने राहुल से कहा:- कोई बात नही भैया, एक साल फिर से मेहनत करके पैसा जोड़ेंगे, बुरारी प्लॉट के लिए किसी से दस्ती या लोन पर लेकर पैसा दे देंगे।
सभी लोग रूम हीटर जलाकर बात कर रहे थे। ऐसा लग रहा था की एक तूफ़ान जो परिवार की जड़ को हिलाकर चला गया हो, 25 साल बाद आई इस खुशी को छीनने की कोशिश करके चला गया हो।
गुनु के मां रितु ने कहा:- कल आप नौकरी पर नही जायेंगे, सबसे पहले घर पर रहकर टर्म इंश्योरेन्स के साथ साथ मेडिकल इंश्योरेंस करवाओ।
रितु की सास ने कहा :- इसकी क्या जरूरत है? खामख्वाह पैसे बरबाद जाते है।
रितु पढ़ी लिखी थी।
उसमे मां को डांटने की जगह समझाना उचित समझा।
मां, जो हमने खर्च किया चार लाख गुनु के इलाज पर , वह खर्च नही करने पड़ते, साथ ही अगर राहुल को कुछ हो गया तो मैं और गुनु सड़क पर नही आयेंगे हमारा जीवन यापन करने के लिए टर्म इंश्योरेन्स काम आ जायेगा।
राहुल भी हां में बोल पड़ा।
लेकिन टीके तो पांच साल तक सरकारी अस्पताल में ही लगेंगे... मां ने राहुल और रितु को टोकते हुए कहा।
राहुल और रितु ने एक साथ कहा:- हां, मां आप बिल्कुल सही कह रही है, टीके सरकारी अस्पताल में ही बेहतर है।
इस चार दिन का डर इस परिवार ने कैसे झेला वह भी डर डर कर ...यह बखूभी इस परिवार के सभी सदस्यों के चेहरों को देखकर पता चल रह था।
मेरी कलम से