02/10/2026
इसी महीने दो ऐसी खबरें सामने आईं
, जिन्होंने दिल को दो बिल्कुल अलग एहसासों से भर दिया।
एक खबर
दिल्ली की जामा मस्जिद से आई,एक हिंदू माँ अपनी बीमार बच्ची के इलाज के लिए मदद की आस लेकर पहुँची और देखते ही देखते लोगों ने करोड़ों रुपये की मदद जुटा दी। एक माँ की आँखों में उम्मीद लौटी , यह खबर दिल को सुकून दे गई।
और दूसरी तरफ दरभंगा से आई एक खबर ने दिल को भीतर तक व्यथित कर दिया। एक मुस्लिम व्यक्ति के जनाज़े को कब्रिस्तान तक ले जाने के रास्ते में कथित तौर पर रुकावट पैदा की गई और आखिरकार लोगों को पानी और नदी पार करके जनाज़ा ले जाना पड़ा।
एक तरफ इंसानियत की ऐसी तस्वीर, जो दिल को रोशन कर देती है
और दूसरी तरफ ऐसी तस्वीर, जो हमें सोचने पर मजबूर कर देती है
आखिर हम कहाँ पहुँच गए हैं?
हिंदुस्तान तो वह देश था जहाँ
मंदिर की घंटियाँ और मस्जिद की अज़ान साथ,साथ गूँजती थीं।
जहाँ हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई एक,दूसरे के सुख-दुख में खड़े होते थे।
क्योंकि हमारी पहचान सिर्फ हमारे धर्म से नहीं थी
हमारी पहचान हमारी इंसानियत से थी।
न जाने कब और कहाँ से नफ़रत की यह आग हमारे बीच आ गई।
न जाने किसने हमारे दिलों के बीच इतनी दीवारें खड़ी कर दीं।
इंसानियत मेरा पहला धर्म है।
काश, हम सब अपनी,अपनी आस्थाओं को दिल में रखते हुए, एक-दूसरे के लिए इंसान बने रह सकें।
यही तो हमारे हिंदुस्तान की असली खूबसूरती है।
इसे बचाना हम सबकी जिम्मेदारी है।